बच्चों का भीख मांगना छुड़वाया, पढ़ाई में लगाया


सनशाइन होप समिति की फाउंडर सिमरन चौधरी ने भीख मांगने वाले गरीब बच्चों का दर्द महसूस कर उनके भविष्य के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया

जयपुर। भीख मांगते गरीब बच्चों का दर्द महसूस कर उनके भविष्य के लिए कोई अपना जीवन समर्पित कर दे तो इससे बड़ी बात क्या होगी। जयपुर निवासी सिमरन चौधरी महिला सशक्तीकरण की वह मिसाल हैं जिन्होंने एक हाउसवाइफ से एनजीओ संचालिका तक का संघर्षपूर्ण सफर अपने जोश, जुनून और जज्बे से पूरा किया। मात्र 3 गरीब बच्चों से शुरू हुआ यह सफर आज 51 बच्चों तक पहुंच चुका है। सनशाइन होप समिति की फाउंडर सिमरन चौधरी बताती हैं कि वर्ष 2012 की बात है, एक दिन मेरे हवासड़क स्थित घर पर गरीब बच्चे भीख मांगने आए। मैंने उन्हें खाना दे दिया। इसके बाद वे रोज आने लगे। मैंने महसूस किया कि ये बच्चे भूख की वजह से ही भीख मांगते थे, जबकि उन्हें भी यह अच्छा नहीं लगता। मुझे बहुत दु:ख हुआ कि खाने के लिए इन छोटे बच्चों को घर-घर भीख मांगनी पड़ती है। मैं उन्हें रोज खाना देने लगी। बाद में उन्हें घर में अंदर बुलाकर खाना खिलाने लगी। इस दौरान मैंने जाना कि ये बच्चे इसी कारण स्कूल नहीं जाते क्योंकि इन्हें भीख मांगकर अपने खाने का इंतजाम करना पड़ता था। मैं इन्हें खाना खिलाने के साथ-साथ थोड़ा बहुत पढ़ाने भी लगी। यहां तक कि मैंने इन्हें अपना नाम लिखना सिखा दिया। शुरू में तीन बच्चियां ही थीं, लेकिन बाद में कुछ और बच्चे भी आने लगे। कॉलोनी की ही कुछ महिलाएं भी मेरा साथ देने लगी। तब हमने सोचा कि केवल खाना देने की बजाय इन बच्चों को सेल्फ डिपेंडेंट बनाना होगा। सालभर में 3 बच्चों से बढ़कर 40 बच्चे हमारे पास आने लगे। ये सभी बच्चे झुग्गी-झोपडिय़ों में रहने वाले गरीब परिवारों के थे। हमने इनके परिवारों में बातचीत कर इन बच्चों का स्कूल में एडमिशन करा दिया। इन परिवारों की महिलाएं भी हमारे संपर्क में आ गईं। रोजी-रोटी के लिए इन्हें काम की तलाश थी। हमने कुछ लोगों के सहयोग से इन्हें सिलाई मशीन दिलवाई और कपड़े के बैग बनाने का प्रशिक्षण दिलवाया। कॉलोनी के बुजुर्गों ने गरीब बच्चों व महिलाओं की मदद की सराहना की तथा सलाह दी कि इस नेक कार्य को एक संस्था के जरिये करो, जिससे अन्य लोगों का भी सहयोग मिले। तब 2013 में सनशाइन होप समिति की स्थापना की और राम नगर में किराये का स्थान लेकर बच्चों का आश्रम बनाया। सिमरन के अनुसार आज उनका एनजीओ 51 बच्चों के लिए काम कर रहा है। ये बच्चे अपने परिवार के साथ ही रहते हैं, लेकिन स्कूल के बाद हमारे आश्रम में आ जाते हैं, जहां उन्हें खाना दिया जाता है और पढ़ाई से संबंधित समस्याएं दूर की जाती है। अंग्रेजी ग्रामर व कम्प्यूटर की शिक्षा भी देते हैं। समय-समय पर एनजीओ से जुड़े बुद्धिजीवी इन बच्चों को ज्ञानवर्धक बातें सिखाते हैं। संस्कार सबसे पहली चीज है, जिस पर हम फोकस करते हैं। ये सभी बच्चे अब साफ-सफाई से रहते हैं और भीख मांगने की बजाय पढ़ाई पर पूरा ध्यान देते हैं। आश्रम में 4 से 17 साल तक के बच्चे हैं, जिन्हें सशक्त नागरिक बनाने का जिम्मा हमने लिया हुआ है। ऐसे कार्य से मन को सुकून मिलता है। सिमरन बताती हैं कि उन्हें बहुत से लोगों का सहयोग मिलता रहा है, जिसके लिए वे शुक्रगुजार हैं। परिवार में पति और बेटा भी पूरा सहयोग देते हैं। सरकार के भिक्षावृत्ति उन्मूलन अभियान के तहत भी सनशाइन होप समिति को प्रोजेक्ट मिलने लगे हैं। युवावस्था में ही सिमरन ने समाजसेवा के क्षेत्र में जो मुकाम हासिल किया है, वह महिला शक्ति का उम्दा उदाहरण है।

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